~लौ~

बुझे मन की वर्तिका से

श्रीहत् उजाला जल रहा

हताश स्थिर बवंडर से

हिचकिचाता रिस रहा

विमुख होआस के

उठते धुंए से

औंधा पड़ा

लकीरों में बह रहा

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मिट्टी हो जब भूमि से

जन्म लेगा फिर दिया

धर्म अपना नए सिरे से

जल के गढ़ेगा कह रहा

 

मन चाह रहा एक बार फिर विश्वास करूँ …कर लूँ?

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