~वारूँ मैं सदके~

नवनीत सी फिसल कर हमारे हाथों से नयी पीढ़ी के हाथों बागडोर चली गयी

पीढ़ियों से ढलके
माला के मनके
ठिनके औ ठुमके
चमके औ खनके
जुड़े जो उडके
हवाओं से तिनके
खिल के महके
अपनों में घुल के
डोरी है लोहित
थामे है कसके
सम्हले न टोके
हर्षित हो झलके
आँखों से टपके
होंठों पे थिरके
मन-मन में दीये
जलाऊँ जी भरके
नज़र के टीके
वारूँ मैं सदके

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