~ झुर्रियों से झिर्रियों तक ~

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पकी उम्र की दीवारों की

भदरंगी सुगबुगाहट

 पिघलती कालिमा के मध्य

उमगती चुटकी भर हरीतिमा

 एक अंजुरी धूप की

दबी ढंकी गुनगुनाहट

बंद कपाट बेचैन सांकल

झुर्रियों से झिर्रियों तक

जोहे छुवन ,आमद आहट

एक दुनिया ढल रही है

एक संवर कर निखर रही है

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~वारूँ मैं सदके~

नवनीत सी फिसल कर हमारे हाथों से नयी पीढ़ी के हाथों बागडोर चली गयी

पीढ़ियों से ढलके
माला के मनके
ठिनके औ ठुमके
चमके औ खनके
जुड़े जो उडके
हवाओं से तिनके
खिल के महके
अपनों में घुल के
डोरी है लोहित
थामे है कसके
सम्हले न टोके
हर्षित हो झलके
आँखों से टपके
होंठों पे थिरके
मन-मन में दीये
जलाऊँ जी भरके
नज़र के टीके
वारूँ मैं सदके