~अपने जड़ों की परिधि~

केंद्र में स्थित दो आंखें

एडी से धरा को दबाती

गोलाप्रकर सी

चरों तरफ खींच लेती

अपने जड़ों की परिधि

सींचती रहती

खुद के बनाये घेरे को

उग आये जिसमें

कंटीले बाड़

रेखाओं के भीतर

चुभती नुकीले पाश

अनुभूतियों में उलझे

हल्के गाढे छोटे बड़े

विधिना के वलय

विमुख हो बुद्ध हुए

जाना और माना

नियोजित रंगों का

श्वेत श्याम जीवन दर्शन

व्यर्थ मोहन / सम्मोहन

घायल हो रहा केंद्र

प्रश्नचिन्ह रहेगा शेष

अनुत्तरित

सदा सर्वदा