~ हम :गत कथ्य ~

ham...

हम उर्वर भी हम बंजर भी

हम शक्तिपुंज पर निर्भर भी

हम आयुष्मान मृतप्राय सदृश

हम सहें दृष्टिकोण के खंजर भी

हम केंद्र कभी और परिधि भी

हम पियूष कवच विष औषधि भी

हम मान कभी   बे माने भी

हम सारहीन सारार्थी,सतत ताने भी

हम नेपथ्य हुए बिन अंत ,अदृश्य

यवनिका गिरी नहीं पर खेल खतम

हम मूक बधिर पात्र भी दर्शक भी

हम कथ्य शून्य गाथा के

धुंधले अक्षर और निरर्थक भी

(सारार्थी-लाभ उठाने का इच्छुक )

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11 thoughts on “~ हम :गत कथ्य ~

  1. हम जड़ भी जोगी रमता भी
    ये समता और विषमता भी
    सब तुमको अर्पित है दीदी
    तुम दो डंडे भी ममता भी

    🙂 🙂

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  2. सृष्टि में मानव की भूमिका पर प्रकाश डालती सुन्दर दार्शनिक रचना |

    जगत की नाट्यशाला में नाटक करने सब आते है
    निर्देशक के निर्देशन में किरदार बदलते जाते है,
    परिस्थितियों के संग मात्र भूमिकाएं बदलती रहती
    जीवन पर्दा गिरने तक हम नाटक करते ही जाते है |

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  3. कमजोर होते कांधों की पीड़ा महसूस कर पाना आसान नही .. वक्त ही कहाँ होता है चश्मा लगा देखने का जब अपनी आँखें दुनिया के रंगों को देखने में खोयी हों … अच्छी रचना कुछ देर सोचने का आग्रह करती हुई

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  4. ——
    माया दृश्य दिखाए पहले
    सुख दुख सारे व्यक्ति झेले
    जब आता है अंतिम पड़ाव
    ईश्वर न रखे कोई दुराव
    वह तो अहसास कराता है
    जग से सब झूठा नाता है
    कर्मो का भोग फिर भोग कर्म
    जीवन का इतना नाता है
    कर्म ही देते सदा सुख-दुख
    बहन जग से यही नाता है।

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