~~आम की सूखी टहनी ~~

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रंग रोगन करे हुए
मैक्रमें धागों की रंगोली में
बया का घोंसला धारे
चित्ताकर्षक
मनमोहक
अपनी उपस्थिति से
लुभाती
ईर्ष्या द्वेष का बीज
उपजाति
 अनायास ही
 भवितव्यता बन गयी
उसी कलात्मक हाथों के
जीवन की

 हम खुद ही
अपने हाथों से
रचते हैं
अनजाने ही
 अपनी किस्मत

सूखी  टहनियों पर
खाली घोंसला
या फिर
निर्जीव टहनियों में
भरते
 जीवन के रंग
वैभव के वातायन से
ले कर आते
जीवन की गंध
सायास रखते
जीवंत
अपना घोंसला

हठात
आदतन अभ्यास कर
पूर्ण हो जाते
अपनी उपस्थिति से
स्वयंसिद्धा बन कर

सच झूठ से परे
बीतते हैं
दौड़ते खिसकते
सरकते फिर रेंगते  हैं
 और
पूरे हो जाते हैं

जीवनपर्यंत
स्वावलम्बन से
सुसज्जित
हर्षित …
मैंने माना
तुम भी मान लो ना !!!
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2 thoughts on “~~आम की सूखी टहनी ~~

  1. गहन भाव को लिए सटीक रचना | आपके कथन से सहमत हूँ कि -‘ सूखी आम की शाखा पर घोसले के सामान कलाकार जिस प्रकार सौन्दर्य की सृष्टि करता है उसी प्रकार हम अपने जीवन के ताने बाने को बुनते हैं शुष्क जीवन में वास्तविक रस का संचार तो नहीं हो सकता लेकिन स्वालंबन से शुष्क एवं नीरस जीवन में सुख सुविधाएं एकत्रित कर आकर्षित और हर्षपूर्ण बनाया जा सकता है और जीवन की गाडी को जीवनपर्यंत किसी न किसी रूप में चलाया जा सकता है|’

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