~ गेहुंवी पारदर्शी अपराजिता ~

खोखला अस्तित्व,गूंगी गेहुंवी पारदर्शी भवितव्यता

वातावलंबित बंसुरी सी सुरीली दिव्य अपराजिता

असंख्य तृण अदृश्य जोड़ प्रणम्य प्रकृष्ट पूर्णता

अहंकार दंभ समक्ष शांत निर्मल गतिमान गर्विता

कर मानमर्दन,दृढ ढाल शक्तिपुंज पावन अस्मिता

सहन वहन नत नयन प्रतिबद्ध पारंपरिक सौम्यता

अहिल्या के आँचल में उगती वृंदा की पावन दिव्यता

रोपती पीढ़ियों की रगों में संस्कार रत्न गर्भा वन्दिता

अमूर्त हुआ मूर्त धरा पर श्रद्धेय सदा परम पुनीत ऋजुता

 (ऋजुता – सरलता,छल-कपट आदि से दूर रहने की प्रवृत्ति)

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12 thoughts on “~ गेहुंवी पारदर्शी अपराजिता ~

  1. समुचित शब्दों से विलास , दिखाता छटा यहाँ अनुप्रास,
    सटीक उपमाओं से बहन, वर्णित की तुमने अपराजिता|

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  2. ” रोपती पीढ़ियों की रगों में संस्कार रत्न गर्भा वन्दिता
    अमूर्त हुआ मूर्त धरा पर श्रद्धेय सदा परम पुनीत ऋजुता ”

    Bahut sundar likha hey didi, aap mann key bhavon ko bahut sateek shabdon mey likh daalti ho …… mujhey tuo yeh aap par divya prabhu-kripa hi dikhti hey. aapko sundar rachna key liye bahut bahut badhai didi _/\_

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  3. ये तस्वीर ऐसी थी ही की किसी संवेदनशील मन में कविता को अंकुरित कर दे , और मेरी दीदी के बिम्ब , क्या कहने
    सहन वहन नत नयन प्रतिबद्ध पारंपरिक सौम्यता
    अहिल्या के आँचल में उगती वृंदा की पावन दिव्यता,

    जितनी दूर कोई इस भाव के साथ जा सकता था उतना गयी हो आप दीदी … और जितना पास ये कविता ला सकती थी उतना पास भी आई हो
    खोखला अस्तित्व,गूंगी गेहुंवी पारदर्शी भवितव्यता…..

    और फिर जैसे तस्वीर को ही एकाकार कर लिया गया हो … यहाँ ये स्वयं साक्षात्कार है स्पष्ट

    रोपती पीढ़ियों की रगों में संस्कार रत्न गर्भा वन्दिता
    अमूर्त हुआ मूर्त धरा पर श्रद्धेय सदा परम पुनीत ऋजुता !

    आपकी दृष्टि का लक्षांश पाना ही अभीष्ट है दीदी !!

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