~मौसमी कुहासा~

मौसमी  कुहासा
मद्धम सूरज  संकुचित..सम्मोहित
निज तेज कर तिरोहित
निहारता रहा..धुंध को
अपलक ..उल्लसित..
ऋतू दर ऋतू ..चिर प्रतीक्षित
शीतल स्पर्श  ‘है’  अपेक्षित
अनसुनी कर.. .पुनः संयमित
विधना में तपन थी मर्यादित
ठिठका था पल भर को
समेट इस पल को..
चल पड़ा अपनी पुरानी चाल..
स्वभावगत …नैसर्गिक…

पुर्णतः  व्यवस्थित..mausmi kuhaasa 4

~ गेहुंवी पारदर्शी अपराजिता ~

खोखला अस्तित्व,गूंगी गेहुंवी पारदर्शी भवितव्यता

वातावलंबित बंसुरी सी सुरीली दिव्य अपराजिता

असंख्य तृण अदृश्य जोड़ प्रणम्य प्रकृष्ट पूर्णता

अहंकार दंभ समक्ष शांत निर्मल गतिमान गर्विता

कर मानमर्दन,दृढ ढाल शक्तिपुंज पावन अस्मिता

सहन वहन नत नयन प्रतिबद्ध पारंपरिक सौम्यता

अहिल्या के आँचल में उगती वृंदा की पावन दिव्यता

रोपती पीढ़ियों की रगों में संस्कार रत्न गर्भा वन्दिता

अमूर्त हुआ मूर्त धरा पर श्रद्धेय सदा परम पुनीत ऋजुता

 (ऋजुता – सरलता,छल-कपट आदि से दूर रहने की प्रवृत्ति)

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~ देखो दो साल हो गये…. 29th nov 2014 को ~

देखो दो साल हो गये…. 29th nov को  …  मुझे याद भी नहीं रहा  … कितना समझाया था पर नहीं माने…  यहाँ कोई आता जाता नहीं   … में भी कहाँ आती हूँ  … जब बहुत अकेली होती हूँ तब ही कुछ वक़्त बिताने यहाँ चली आती हूँ   … एक ठिकाना मिल गया दोषारोपण का …  अब thnx बोलूं इसके लिए भी … हद है सच्ची

हृदयकोष की अपनीली बात

मृत्युंजयी नमकीली सौगात

स्मृतियों में शेष आभासी प्रगास

प्राण दायनी छुवन, स्नेहिल सुवास

अनमोल रिश्ते ….  अनमोल पलों की अकूत निधि