~धुअंठे किनारे~

देह कोठारे

अवगुण सकारे

जल में शर्करा ज्यूं

भिने है सारे

धर्म कर्म बुहारे

धुअंठे किनारे

सत्य निष्ठ इशारे

अप्रासंगिक सहारे

मूक बधिर मन
मौन गुहारें
dhuanthe kinare