~ढूंढ़ता फिर रश्मियाँ~

vaani vilaas
क्षितिज पर रोपा सूरज तुम्हारे हवाले से
सांझ डूबा एक बार फिर दुश्वारियों में
बहेगा जो दरिया चाँद की मछलियों से
सोंधी सुगंध थर्राएगी भीगी अंजुरियों में
रात का क़र्ज़ ना चुका अकेली हिचकियों से
लाचारगी गहरायी अँधेरे की परछाइयों में
जज़्ब हुई घनीभूत बूँदें …बरसीं पुरवाइयों से
किस्तों में टप टप टपक मेघों की अंगडाइयों में
ढूंढ़ता फिर रश्मियाँ कुछ अटल ध्रुव गहराईयों से
उगता दिशा देती धूमिल चांदनी की अरुणाईयों में
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6 thoughts on “~ढूंढ़ता फिर रश्मियाँ~

  1. जिस तरह के शब्द आप अपनी अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग में लाते हो दी.,, उनका आकर्षण अद्भुत होता है अक्सर ही भाव पक्ष और शब्द चयन में मानो होड़ सी लग जाती है की कौन श्रेष्ठ ! बहुत सुन्दर और कलात्मक सृजन !

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