~ यूँ ही ~

 जब अनगिनत प्रकाश हो…तो कितनी सारी  परछाईयाँ ..बन जाती हैं…एक दुसरे में गडमड  होती हुई…धूमिल सी पड़ती….परन्तु जीवन..में हर रोज़..एक नए.. .एकलौते सूरज का अकेले सामना होता है….तो ये परछाई…और पास आ जाती है…..जितनी ज्यादा की तपिश ..उतना करीब.पैरों के नीचे से उठ कर…दिल के करीब…उनसे प्यार होना लाज़मी है…..और उससे बढ़ कर..उसे स्वीकारना….रंगहीन बुलबुलों में  इन्द्रधनुष यूँ ही तो नहीं सजता ….

~ प्राण प्रतिष्ठित ~

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तोड़ तोड़ आकार दिया
प्राण प्रतिष्ठित साभार किया
जोड़ जोड़ लाचार किया
पाषाणित कर असार किया
छोड़ छोड़ स्वीकार किया
शूलों से श्रृंगार किया
मोड़ मोड़  नकार दिया
लिपा पुता दुलार किया
पोर पोर प्रहार किया
कैसा सतही संसार जिया

घूँट घूँट संस्कार पिया
जड़ जीवन भरमार जिया ~~

~~patthar