~ एकल पोषित ~

ekal poshit

रेखा संचित  … विधि संचालित

आगत विगत  …. पूर्व निर्धारित

नक्षत्राधीन अहोभाव फलित

कर्माधीन व्यवहार निहित

आदि अंत  का नियत गणित

अनुभूति द्वय अब नहीं रचित

एकांगी पीड़ा  …. एकल पोषित

एकाकी जीवन  … शून्य घटित

 

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सुना है जो बोते हैं वही काटते हैं … इसी भरोसे आस और विश्वास से … साथ में … साथ के.. छन छन कर मिले जीवन की अनमोल बूंदे बरसा कर भाव कोष में कुछ जीवंत पल रोपे ….अलभ्य सा बीज अनायास ही मन आंगन में जो आ गिरा था…बड़ी शिद्दत से उसे सहेजा ….हर क्षण नयी कोंपल महका जाती मन वीथियों को …नित नूतन फल की आस से समृद्ध होता गया ह्रदय कोष …. विधि का लेखा अपनी ही आंतरिक निधि अपने ही वैभव से अचंभित होने के साथ ही इतराना नहीं भूल रहा था …. हमे तो बस दूर से लहलहाते देखना था उन पलों को….पर फिर आ ही गये किन्तु परन्तु 😦
कुछ ज़्यादा ही चाह लिया शायद …… या फिर अलगाव से हि भावात्मक लगाव सुदृढ़ होते हों …… क्या पता …. मोय नाय सर