~मोतिया घास~

कतरा कतरा भिनती हूँ सांस भर

युगों से कई तहों में प्रहरों प्रहर

कभी मरहम बन

दिन भर के दाह को

ठंडक पहुंचाती हुई

स्वयं ही ठंडी पड़ जाती हूँ

कभी जलते हुए तवे पर

पानी के छींटे की छुन्न से

लय मिलाते हुए सुन्न हो जाती हूँ

फिर भी मुंदी पलके निहारती

उस टिमटिमाते उजास को

प्रकाशित होता जो अंशुमाली के देय से

रूपांतरित कर उस अग्नि को

अपनी शीतलता से

हर लेता समस्त ताप

अपनी चांदनी में समेट

गढ़ने लगता सौंदर्य के नए प्रतिमान

भिगो देता है मुझे अपने रंग में

खिल उठती हूँ बिना प्रतिवाद

तो क्या हुआ नहीं हूँ मोती माणिक

वाष्पित होने से पूर्व तक

हूँ पूर्ण … नम सी मोतिया घास

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5 thoughts on “~मोतिया घास~

  1. वेदना से ताजगी तक का सफर ……… जलते तवे पर पानी के छींटे से नम सी मोतिया घास ……. वो तुहिन 🙂

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  2. कविता का काव्य वैभव उसके आकर्षण का कारण होता है , आपकी रचनाएं पढ़कर स्वतः उसमेँ बहना कोई नई बात नहीं है मेरे लिये ऐसा अक्सर होता है कि आपकी रचना के शब्द … भाव , भावना और कल्पना के बहाव मे एक अनूठा तादात्मय स्थापित होता है
    इस पीड़ा जनित मधुर करुण सरल तरल रस से मैँ सराबोर हो गयी
    इस अगाध वैभवशाली करुणा पर वारी जाऊं दी.

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