~मोतिया घास~

कतरा कतरा भिनती हूँ सांस भर

युगों से कई तहों में प्रहरों प्रहर

कभी मरहम बन

दिन भर के दाह को

ठंडक पहुंचाती हुई

स्वयं ही ठंडी पड़ जाती हूँ

कभी जलते हुए तवे पर

पानी के छींटे की छुन्न से

लय मिलाते हुए सुन्न हो जाती हूँ

फिर भी मुंदी पलके निहारती

उस टिमटिमाते उजास को

प्रकाशित होता जो अंशुमाली के देय से

रूपांतरित कर उस अग्नि को

अपनी शीतलता से

हर लेता समस्त ताप

अपनी चांदनी में समेट

गढ़ने लगता सौंदर्य के नए प्रतिमान

भिगो देता है मुझे अपने रंग में

खिल उठती हूँ बिना प्रतिवाद

तो क्या हुआ नहीं हूँ मोती माणिक

वाष्पित होने से पूर्व तक

हूँ पूर्ण … नम सी मोतिया घास

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~ जोहती परछाइयाँ ~

Image.

 

उष्मित हथेलियाँ
 जोहती परछाइयाँ
 
हिचकिचाती हिचकियाँ
अनवत्व  उदासियाँ

दारुण दखलन्दाज़ियाँ
निर्विकार रुदालियाँ

बासी हुई कहानियाँ
उदासीन उबासियाँ

 वाष्पित छुवन बोलियाँ
 यदृच्छया अलानियाँ

अलभ्य जीवन अनुभूतियाँ

अनारत संचित स्मृतियाँ

 (अनवत्व – जीवन से भरी  , अनारत – अनवरत /अमिट ,यदृच्छया-मनमाना  …  कोई नियम  न हो जिसका ,अलानियाँ -डंके की चोट पर , )