~ ऋण ~

ऋण भुवन का
ऋण छुवन का
ऋण जतन का
ऋण मनन का
ऋण चयन का ….
ऋण सासों का
ऋण बातों का
रिश्तों का
अहसासों का….
अकारण
अथाह
अनंत …
उऋण कब?
उऋण कैसे ?…

सम्मुख प्रश्न ज्वलंत …

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6 thoughts on “~ ऋण ~

  1. स्वाद नेह का
    जाना भी है
    या बहा चले

    स्वाद प्रेम का
    याद भी है
    या भूल चले …

    स्वाद दर्द का
    छुवा भी है
    या उतार चले …

    स्वाद आदर्श का
    लिया भी है
    या तौल चले ….

    —————————

    इस सम्पूर्ण ब्रम्हांड में गोल धरा पर अपने हिस्से का चौकोर टुकड़ा सम्हाले रखना सहज सच ही नहीं है …. माटी का जलता हुआ दिया …. चलो उसी को निहारती हूँ ….पाती हूँ उसी से हिम्मत ,ऊष्मा और प्रकाश

    दग्ध तरल भावों में डूबी
    बटी हुई अचल पड़ी बाती के सिरे पर नन्ही सी लौ
    क्षण क्षण कम्पन (फिर भी ) ….

    छलकाये आस भर उजास
    पार आँखों कि लकीरों का श्रृंगार
    बिखरते अस्तित्व का संवार
    निःस्पंद वर्तिका के समर्पण का रख मान
    बिखेरती प्राणप्रण प्रकाश

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  2. सभी ऋण स्मरण कर अपने ,
    निज मन वर्तिका जलाती हो,
    नहीं कृतध्न उपकार याद कर
    ऋणमुक्त स्वयं हो जाती हो ।
    निज प्रयास से इस जग का
    अन्धकार मिटाते ही जाना,
    तन दीपक से मन बाती को
    स्नेह सिंचित करते जाना ।

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