~ खयाल से रखियेगा …. ~

स्मृतियों  से भारी   है तरकश जो खाली 

क्षणांश  के लिए ही सही  …. पूर्णता का आभास कराता पल  …. जो आज भी उतनी ही शिद्दत से जीवंत कर देने का सामर्थ्य रखता है  …. उसी अधिकार से सुकून पहुंचाता है  …. सांस दर सांस अपने होने का भान कराता है  …. पर मस्तिष्कहीन ह्रदय जो है न  … अनुभूति और अनुभव के द्वन्द को नहीं जानता   … उसकी छुवन कि चाहना का क्या करूँ  …

इतना अलभ्य क्यूँ हो गया  …. पहुँच से कोसों दूर  ……आसमानी  हुआ पल  …. हाँ  …. मुझे दिख तो रहा है…… पर सुन भी रहा है क्या  … क्या पता

हठ था  ….पूरा किया  …एक दिन नहीं …देखो एक साल हुआ  …ख़यल से रक्खा भी  …. पर उसका होना न होना आज भी बेमानी  …… तुम जो नहीं
मिलोगे क्या कभी कहीं ?

 

~ ऋण ~

ऋण भुवन का
ऋण छुवन का
ऋण जतन का
ऋण मनन का
ऋण चयन का ….
ऋण सासों का
ऋण बातों का
रिश्तों का
अहसासों का….
अकारण
अथाह
अनंत …
उऋण कब?
उऋण कैसे ?…

सम्मुख प्रश्न ज्वलंत …