~ तुम हो …. हो न ?? ~

पूर्णता  की चिर आकांक्षी कल्पना का

आभासी मूर्त आकार हो तुम
उदय होते  ही अस्त हुए
लरजती गोधूली की गोहार हो तुम
भीतर बंध  …मुक्त हुए 
आँचल में सिमटा  जीवन सार हो तुम
स्मृति कलश के  बूंदों की
अहर्निश बहती नम बयार हो तुम
तर्पण कर  स्मरण में

जीतेजी जीती हुई निज हार हो तुम