~शेष हुई अनकही कहानियाँ ~

 

 

पिघलती चांदनी की भी तपिश से

निशि भर झुलसती भावोर्मियाँ
अधमुंदे कपाट में अहर्निश चुभती है
परिध्रुवी तारे की आसमानी बेड़ियाँ
चाँद के फाहे से पसीजी …सुलगती रहीं
हथेली में लकीरों की आंधियाँ
तलाशती रहती ठौर और ठिकाने फिर भी
हर बार दोहराती ,जानी बूझी नादानियाँ
स्याह नीरव सन्नाटों की चिर सहेली

पल पल अकेली बेचैन बेचैनियाँ

धरा के संकुचित अंबर में शेष हुई
अनगिनत अनकही  कहानियाँ

 
( परिध्रुवी तारा-ध्रुवीय सिरे पर स्थितऐसे तारे जो अहर्निश आँखों के सामने रहे प्रत्येक रात स्पष्ट दृष्टिगत  होता रहते है  ,अंबर – परिधि )

 

~साक्षात्कार ~

 

दीक्षित हूँ आशाओं के बीज बोने में
संस्कारित हूँ आनंद वृक्ष  उगाने  में
सुख  के फल खाने और खिलाने में
चुटकी भर स्मित से मन भरमाने में
सुवासित सुहास का नीर बहाने में
नैसर्गिक है …प्रयास नहीं …. सायास नहीं

इसीलिए  …

दुर्लभ थे कपास के फूल जिन्हें
मलमल भी था भाग्य नहीं
रेशम मखमल से सजा दिया
अपने हिस्से का अंजुरी भर सूरज
थोड़े से टिम टिम तारे भी
टांक चांदनी की धड़कन में
उजास भरा उपहार  दिया
 
ओह !! 
ये तो है युगधारा से प्रतिकूल प्रवाह
अतिसाधारण सोच का असाधारण निबाह
फिर से अभी अभी इसी एक क्षण में
रेशम डंक की तीक्ष्ण चुभन
अनायास आकर  जता गयी
लगता है ,लो.फ़िर अनजाने में एक बार
”सत्याचरण मार्ग’से निकल गयी

पर सोचो तो  …. कैसा होगा जीवन

अनिवार्य सांसें और निर्जीव देह
विकलांग विचार और यांत्रिक नेह

ठहरो  …. करती हूँ अपांग जीवन से इनकार

करना है मुझे दर्पण से साक्षात्कार