~निद्राविहीन निशाचर लोचन ~

अनुभूति द्वय अनंतरित विश्यंद
षटरस पूरित  अवध्वस्त यामिनी
सिहरे  …सिमटे , चकात  चांदनी
खोले अवनद्ध अनगिन भोथर वातायन
नितप्रति आयोजन ,स्तिमित मंथन शोधन

निद्राविहीन निशाचर लोचन

(अनंतरित -अखंड अटूट ,विश्यंद-क्षरण  ,अवध्वस्त-तिरस्कृत ,चकात -भौचक से भी ज्यादा अवाक होना ,अवनद्ध-ढका/बंधा,भोथर-जंग लगा  जिसकी उपयोगिता  क्षीण हो ,स्तिमित-आद्र /स्थिर)

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~सहज संवेदना ~

मन- भाव … मंत्रणा
द्वन्द -व्यथा  …. वेदना
नैसर्गिक प्रवाह निग्रहण
नियंत्रण  … प्रकल्पना
मनो -दैहिक …. यंत्रणा
विधि नियोजित देह -धर्म…व्यर्थ घर्षणा
दीपान्कुर घृत… सहज संवेदना

(निग्रहण-दमन ,प्रकल्पना-स्थिर करना,निष्कर्ष का पूर्वानुमान ,स्वक्त-संलिप्त ,दीपान्कुर -दीपक की लौ )

‘भीगी भोर’

 

एक कटोरी सूरज में लबालब भरे मेघ
पिघलते रहे भीतर ही भीतर
चंद बूँद छलकीं पाया गूलर के फूल पड़ा नेग
अनवरत बेचैनी अतृप्त कोर
सुलगता रहा समिधा सा तरल भावों का वेग
चिरप्रतीक्षित साँसों को …  ‘भीगी भोर’