~स्वाती बूँद ~

अकारथ स्वाति बूँद सीपी में
भीगी,ठहरी,बिंधी .. चुभी कहीं
फिर भी ……
मोती न बनी !!!!
अभीप्सित अमृत तृषित ह्रदय को
सम्मुख अनवरत श्रावण धार
अकारण अवधीरण  प्रारब्ध में
 सकुचाये धर्म मेघ भी
बरस रहे अब आवरण में
बरस बरस नुत प्रकृति सँवारे
अनतस तृष्णा की बिछी रहे बिसात

(अकारथ-निष्फल,अभीप्सित -अभिलाषित उत्कट इच्छा ,श्रावण -१ सावन मास २ जो सूना जाए , नुत -वन्दित स्तुत )

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~ में हवा ~

सतत प्रवाहित बंधन मुक्त पावनी
यत्र तत्र सर्वत्र अस्तित्व प्राण वाहिनी 
मौन व् मनन के सम्मिलन की जीवंत संगिनी
नीरवता के रव में निस्पंद उन्मुक्त बंदिनी
छुवन मिथ्याभास नहीं मृदु स्पर्शी मन भाविनी
बांस  झुरमुट से निकल वंशी धुन ठाठिनी
जाने कब दबे पाँव रख जाती दिल पे हाथ चोरनी 
भाव तिग्म के जाल्म  ताप में बन  तसल्ली की रागिनी
सर्व सुलभ सदा उप्लम्य हूँ गलांश भाविनी

 (तिग्म-सूर्य,जाल्म -निष्ठुर, उप्लम्य -मिलने योग्य ,गलांश -वो संपत्ति  न कोई मालिक हो न वारिस । )Image