~स्याह रंग में उदासी का चुम्बकीय आकर्षण ~

 स्याह रंग भी उतना ही आकर्षक होता है ..जितना की उदासियों के  दुशाला का सम्मोहन ….उसकी गहरायी की कोई थाह नहीं होती  …उसमें समायी ठंडक  ……उसमें समाया एक निर्लिप्त मौन ….कितना उदार होता है …..सब कुछ समेट  लेता है अपने भीतर की ऊष्मा में सहज रूप से…न जाने कितने रंग न जाने कितने रूप न जाने विधि की कितनी सिद्धियाँ सब किसी वशीकरण में हो उस सलोने के आगोश में …… उसकी अनदेखी से नितान्त वैयक्तिक  ”मौन” भी अपना नहीं रह पता …….स्वागतयोग्य हो न हो ….पर…ये उदासियाँ ”मौन” को सतत गतिशील  रखती रहे  ….ये भी जीवंत होने का एक प्रमाण है …..सांसों की यांत्रिक आवाजाही से इतर …

~ढूँढूँ करलूँ उससे दो बात~

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पूनो का बड़का चाँद ,निकट धरा के ..उजली उजली रात
रजत द्युति के दुर्लभ प्रकाश में ,ढूँढूँ करलूँ उससे दो बात
माटी हुआ जो एक सितारा ,आसमानी हो दिया आघात
खर्च ले मुझे या मुझमें घुल जाये कर, दे कर मुझको मात

चुप सी तप्त तृषित मूक धरा की हदबंदी ….
मेघाच्दित आकाश हो या स्मृतियों की बूंदा बंदी का अभ्यास
प्रारब्ध है अंचल में समाते टूटते सितारों का अहर्निश आभास

~अहर्निश फांके ,काल चूर्ण है~

 

  • चाह चरम है लक्ष्य परम है
    अखंड तत्व का अंश भरम है
    आकंठ भरा अवकाश हीन है
    ज्ञान भक्ति और कर्माधीन है
    पूर्ण से शून्य ,शून्य से पूर्ण है
    अहर्निश फांके ,काल चूर्ण है