~मिटटी के डूह~

जाने क्यूँ पत्थर और पहाड़ के समक्ष मिटटी के डूह  का कोई मोल नहीं   होता …जबकि उसमें एक विशेष तरह का समन्वय होता है ..थोडा नर्म थोडा सख्त  ..बस इतना की थोड़े वक़्त को एक ठिकाना दे सके .अहम् है उसकी सौम्यता जो सुकून देती है ….परन्तु  अस्तित्व विस्तार का अवसर उपलब्ध नहीं होता उसे .. …न जाने कब किस वजह से मिटटी में  वापस मिल जाये  ..अल्पायु होना विवशता है या नियति नहीं जानती …ये भी नहीं जानती की ज़मीनी होना ,सौम्य होना औरो को सुकून देना …इसके लिए खुद का में कोई वज़न न रखना अच्छा है या बुरा …पर ना जाने क्यूँ बुरा लग रहा है मिटटी के डूह के लिए शायद इसलिए की ..कुछ इंसान भी  मिटटी का डूह ही होते हैं … जिन्हें गोबर गणेश कहा जाता है …

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2 thoughts on “~मिटटी के डूह~

  1. गनीमत है कि आप गोबर गणेश को जानती हैं मुझे लगा था कि आप कुछ भी नहीं जानती …. बहरहाल ये जो समन्वय है थोड़े नरम और थोड़े सख्त का महत्वपूर्ण तो यही है …अस्तित्व विस्तार एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसका उपयोग आप सदैव सबको निरुत्तर करने के लिए करते हो !

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    • अस्तित्व विस्तार एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसका उपयोग आप सदैव सबको निरुत्तर करने के लिए करते हो !..?????

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