~पाषाणों की भाव्रोर्मिया ..एक मूक अभिव्यक्ति एक सोच ~

शिखर पर स्वर्णिम आभा साए में भीगते सलेटी मेघ
स्थितप्रज्ञ अटल अचल में समाये बहते निर्झर वेग

वीरानगी का आलिंगन ..थामे प्रवाह ..जड़ हो रहा जो गहरे भीतर
अभय अडिग मर्यादित .. रिसता है जिससे जीवन  चारो प्रहर

मिट्टी के अनुदान से जुडी चट्टानें, वजनी है अस्तित्व विस्तार
आभारी  नतमस्तक ऋणी धरा का, निःशब्द उठाती  मौन भार

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देवालय के पावन पत्थर  संजोये ..भीतर मूल्यवान रत्नों की थाती
एकाकीपन की नीरवता में चिरप्रतीक्षित निस्पंद मूक आहटें लुभाती

पाषाणों की भावोर्मियों का भी कोई मोल तो रहने दो
वातोर्मियों के सहारे बिखरा सा सही जीवन छूने  दो

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8 thoughts on “~पाषाणों की भाव्रोर्मिया ..एक मूक अभिव्यक्ति एक सोच ~

  1. ये झिझोड़ देने वाली अभिव्यक्ति…. क्या कहूँ…
    शब्द शब्द शक्ति …
    धरती मान प्रक्रति …
    अद्भुत भान आसक्ति …
    पाषाण प्राण नियति …
    अभी मोबाइल से ही पढ़ा रुक न सकी
    कहना जाने क्या चाह रही हूँ दी….()

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    • ठहरा हुआ प्रवाह
      भीगता अटल
      समेट जलकण
      बहता हुआ निर्झर
      जीवन प्रहसन
      पाषाण अचल …
      tumhara padhna aur usse mere jaise hi judna..zyada mayne rakhta hai mere liye… 🙂

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  2. शिखर पर कोई एक ही होता है, और वो हर समय अकेला होता है….
    बहुत कुछ पाने के बाद भी अकेलापन वो पहलू है, जिसके साथ उसको जीना होता है
    चाहे वो माउंट एवरेस्ट हो, या कोई शीर्ष नेता या शीर्ष अभिनेता…
    कविता के लिए क्या कहूँ, मेरे पास कभी भी इतने शब्द नहीं रहे की ये बता पाउ की कैसी लिखी गई

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    • अब चाहे शिखर पे हो या न हो… रत्न हो या न हो … सच कहा तुमने ..नितान्त एकाकी बना देता है पाषाण होना ….
      तुमने पढ़ मुकेश मेरे लिए यही बात ज्यादा मायने रखती है ..और जानते कविवर ..तुम्हारी दी को कविता लिखना नहीं आता

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  3. uffffffffffff ultimate imagination. mujhe hamesha se hi kuch aisaa padhna tha. sach mai ek mook abhivayakti, per kitna kuch smate hue antermann mai.,…. ki shabdo ki kami hi par jaaaye. .. pattharo ki mook maun bhashaye. or unkaa sansaar…. kahi mann k kisi kone mai ek mook abhivayakti mere b aai. .

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  4. बाह्य आकृति तो भयावह गिरी अहो !
    किन्तु अंतर है सरस कैसे कहो ?
    धन्य है वो दृढव्रती प्रण में अटल
    नेत्र जिनके स्नेह से रहते सजल

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