~पहाड़ी नदी~

 

पहाड़ी नदी में समाये
न जाने कितने समुद्र
प्रवाहित सप्तकों का
लयबढ सन्नाटा
गहरायी की तहों में
अंतरिम ज्वर भाटे में
सम्मोहक नन्ही बूंदों में

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सतह पे आन्दोलन हीन हलचल
भीतरी मौन..ओढ़ लहरिया कम्बल
कुछ अनछुए ..छुई मुई एहसास
आत्ममंथन का अनवरत प्रयास

कोलाहाल  मध्य..महासागर सी शांत गंभीर
सर्वस्व  मिटा कर अनंत में विलीन

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8 thoughts on “~पहाड़ी नदी~

  1. कोलाहाल मध्य..महासागर सी शांत गंभीर … वह कौन है जो यह कोलाहल देख रहा है ? और वह कौन है जो महासागर सा शांत गंभीर है ? और फिर वह कौन है जो इस गंभीरता को महसूस कर रहा है वह मेंरी दी नहीं है … दी इस जगत का नाता है …अंजना और सिन्हा दोनों जन्म के बाद की अवस्थाएं/ अवधारणाएँ हैं जो इन सबको महसूस कर रहा है वह शरीर के हर बंधन से बहुत आगे हैं हर रिश्ते से भी

    हलचल, आन्दोलन रहित …. लहरों के कम्बल के नीचे मौन … कुछ अनछुए अहसास भी
    आत्ममंथन का प्रयास
    सर्वस्व मिटाकर अनत में विलीन

    जबरदस्त द्वन्द और अंतर्विरोधों से भरी हुई कविता…..क्या कहूं कुछ दिन स्वामी आनंद कुमार द्विवेदी ‘राजा बेटा वाले’ को अपने पास रखिये दी, …. लाभ न हो तो किराया अवाती जवाती सहित सारा खर्चा नकद वापस !

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    • स्वामी आनंद जी महाराज ..मेरे अंतद्वंद /विरोधों को पढने का धन्यवाद ..आपका offer काफी आकर्षक है पर सोचती हूँ ऐसे स्वामी का क्या करुँगी जिसका अपनी गर्दन से ही मोह भंग होगया है ….तो इस दी को यूँ ही स्वीकार करिए ..आभारी रहूंगी …

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  2. सुंदर भावप्रवण पंक्तियाँ…. ये आंदोलन हीन हलचल कभी कभी हमारे भीतर भी होती है ….. कभी आँखों मे कभी हृदय मे…. तब पहाड़ी नदी कहीं न कहीं हम सब मे आ बसती होगी…. नहीं ?

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    • हाँ वंदना हम सब में ये नदी विद्यमान है पर कुछ को महसूस होती है … और कोई सायास महसूस नहीं होने देता ……स्नेहाशीष के साथ शुक्रिया भी …:)

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  3. koi shabdon ko itna accha piroye …koi bhaavon ko is prakaar prastut kar sake to ….sansaar ki nirrihta thodi kam ho jaati hai …peeda ki abhivakti ke madhyam jab shabd is had tak ban jaayen to un shabdon ko saare jag mein baant dena chahiye …shayad kahin koi aur bhi aapke taar -shabdon ke udhaar se khhud ko tarangit kar sake …bua get these printed ……

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  4. mujhe kabhi kabhi aapka likha bilkul samjh nahin aata par padh ke pata nahin kyun rona aa jata hai …abhi bhi rone ka hi mann kar raha hai padh ke …….main nahin aaya karungi aapke blog pe aage se …mujhme shakti nahin hai aapke shabdon ke prawaah ko sambhaalne ki …main khud hi doob jaungi ismein

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