~मिटटी के डूह~

जाने क्यूँ पत्थर और पहाड़ के समक्ष मिटटी के डूह  का कोई मोल नहीं   होता …जबकि उसमें एक विशेष तरह का समन्वय होता है ..थोडा नर्म थोडा सख्त  ..बस इतना की थोड़े वक़्त को एक ठिकाना दे सके .अहम् है उसकी सौम्यता जो सुकून देती है ….परन्तु  अस्तित्व विस्तार का अवसर उपलब्ध नहीं होता उसे .. …न जाने कब किस वजह से मिटटी में  वापस मिल जाये  ..अल्पायु होना विवशता है या नियति नहीं जानती …ये भी नहीं जानती की ज़मीनी होना ,सौम्य होना औरो को सुकून देना …इसके लिए खुद का में कोई वज़न न रखना अच्छा है या बुरा …पर ना जाने क्यूँ बुरा लग रहा है मिटटी के डूह के लिए शायद इसलिए की ..कुछ इंसान भी  मिटटी का डूह ही होते हैं … जिन्हें गोबर गणेश कहा जाता है …

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~पाषाणों की भाव्रोर्मिया ..एक मूक अभिव्यक्ति एक सोच ~

शिखर पर स्वर्णिम आभा साए में भीगते सलेटी मेघ
स्थितप्रज्ञ अटल अचल में समाये बहते निर्झर वेग

वीरानगी का आलिंगन ..थामे प्रवाह ..जड़ हो रहा जो गहरे भीतर
अभय अडिग मर्यादित .. रिसता है जिससे जीवन  चारो प्रहर

मिट्टी के अनुदान से जुडी चट्टानें, वजनी है अस्तित्व विस्तार
आभारी  नतमस्तक ऋणी धरा का, निःशब्द उठाती  मौन भार

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देवालय के पावन पत्थर  संजोये ..भीतर मूल्यवान रत्नों की थाती
एकाकीपन की नीरवता में चिरप्रतीक्षित निस्पंद मूक आहटें लुभाती

पाषाणों की भावोर्मियों का भी कोई मोल तो रहने दो
वातोर्मियों के सहारे बिखरा सा सही जीवन छूने  दो

~पहाड़ी नदी~

 

पहाड़ी नदी में समाये
न जाने कितने समुद्र
प्रवाहित सप्तकों का
लयबढ सन्नाटा
गहरायी की तहों में
अंतरिम ज्वर भाटे में
सम्मोहक नन्ही बूंदों में

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सतह पे आन्दोलन हीन हलचल
भीतरी मौन..ओढ़ लहरिया कम्बल
कुछ अनछुए ..छुई मुई एहसास
आत्ममंथन का अनवरत प्रयास

कोलाहाल  मध्य..महासागर सी शांत गंभीर
सर्वस्व  मिटा कर अनंत में विलीन