काश कही ….

समय के पंख लगे होते हैं ..उड़ान की दिशा भी निर्धारित होती है …और वापसी के  मार्ग के नाम पर एक निश्चित दारुण  सन्नाटा …पर पंख तो मन के भी लगे होते हैं …अनंत तक अनवरत उड़ान उसकी भी तो होती है … सोचती हूँ  ..भावनाओं के पंख क्या काष्ठ  के होते हैं ..सीले हुए से अक्सर ..या फिर कहीं दीमक लगी हुई हो उनमें ..अनेकोनेक छिद्रों के साथ भार हीन खोख्ले से ..इसीलिए निर्धारित है उनकी सीमा …और सुनिचित है उनका स्थान …भीतर कहीं कारा में ….जिसकी कुंजी समय के गले में बंधी रहती है …और वो तो बीत जाता है ……बीत ही जाता है अक्सर ….या कहूँ सरक जाता है …हाथों से ..बस यूँ ही …अनायास ..

काश कही दूर क्षितिज पर … अचानक  मिल ही जाएँ दोनों …बीता वक़्त ले आये  कुंजी ..और…. और फिर …ओह …कितना सम्मोहन है इस ख़याल में …बचा हुआ .वक़्त गुज़ारने  के लिए …पर्याप्त से भी थोडा ज्यादा …नहीं????

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6 thoughts on “काश कही ….

  1. बस एक बात थोडा यूँ भी कही जा सकती है वो भी इसलिए की सीली काष्ट के पंख कदाचित पर्याप्त ऊष्मा मिलने पर उर्जावान हो
    सकते हैं पर पाषण के हों तब क्या क्या संभावना होंगी….?

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    • उर्जावान होने से उड़ने का न तो हुनर आता है न ही हौसला …कदाचित जीवंत महसूस किया जा सकता है …और पत्थर ..पत्थर अक्सर रत्न का रूप धारण कर लेते हैं ..कहीं न कहीं मूल्यवान हो जाते हैं .सामान्य और साधारण लोगों की पहुँच से दूर ..और दूसरी बात पाषाण सरलता से अपना रूप नहीं बदलता …न ही वाह्य न ही आन्तरिक .हो सकती है तो बस प्राण प्रतीष्ठ उन्हें पूज्य बनाने के लिए और उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है उसे…. . .अब संभावनाएं …क्या हो सकती हैं …समझ ही गए होगी .

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      • कदाचित जीवंत होने का भान होना ही जीवन है… और जीवन में संभावनाओं का अभाव हो ऐसा होना दुर्लभ नहीं… और दी… पाषाण खंड की जो विवेचना आपने की है… वैसी विवेचना निश्चित रूप से विलक्षण है… और यदि पाषण में ऐसे भाव आप भर सकते हो तो काष्ठ की उपयोगिता तो सर्व जन हिताय ही है… किसी भी परिस्थिति में…. पाषाण में ये विलक्षणता कहाँ…

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  2. भावनाओं के पंख क्या काष्ठ के होते हैं ……shayad.. tabhi to kabhi jal jate hain, dhu-dhu kar ke to kabhi uske andar ke nami ke karan,. jeevan si lagti hai bhavnayen…. par deemak weemak mat lagao 🙂

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