काश कही ….

समय के पंख लगे होते हैं ..उड़ान की दिशा भी निर्धारित होती है …और वापसी के  मार्ग के नाम पर एक निश्चित दारुण  सन्नाटा …पर पंख तो मन के भी लगे होते हैं …अनंत तक अनवरत उड़ान उसकी भी तो होती है … सोचती हूँ  ..भावनाओं के पंख क्या काष्ठ  के होते हैं ..सीले हुए से अक्सर ..या फिर कहीं दीमक लगी हुई हो उनमें ..अनेकोनेक छिद्रों के साथ भार हीन खोख्ले से ..इसीलिए निर्धारित है उनकी सीमा …और सुनिचित है उनका स्थान …भीतर कहीं कारा में ….जिसकी कुंजी समय के गले में बंधी रहती है …और वो तो बीत जाता है ……बीत ही जाता है अक्सर ….या कहूँ सरक जाता है …हाथों से ..बस यूँ ही …अनायास ..

काश कही दूर क्षितिज पर … अचानक  मिल ही जाएँ दोनों …बीता वक़्त ले आये  कुंजी ..और…. और फिर …ओह …कितना सम्मोहन है इस ख़याल में …बचा हुआ .वक़्त गुज़ारने  के लिए …पर्याप्त से भी थोडा ज्यादा …नहीं????

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बहता हुआ कोई भाव है ठहरा

हथेलियों में अक्सर धंसती उँगलियों से
टपकता रहता है लकीरों का नमक
ओट लावण्य  की ले चेहरे  पर
दर्द छुप भी जाये तो क्या हो
हरे होते रहते हैं नासूर
रिसते .. दिखते  नहीं मगर .
तन्हा  सा एक परिंदा ..बेचैन  इर्द गिर्द है
भ्रम है या आदत या  सायास अवहेलना ..
पहचान जो कोई पाए …
सुख है की मुख पर  बहता हुआ कोई भाव है ठहरा

फिर कभी नहीं …?

 Imageपल्लू में बंधी  ..खुली विधना की गाँठ
भरे पुरे आभासी आँचल की तार तार सांठ 
महसूस हुआ दरिया जम  रहा परतों में चाहे अनचाहे
 शुष्क आँखों की हरकतों में कुछ दौड़ता गाहे बगाहे
भीगते रहेंगे  लोन नीर में स्नेह बाती  के अवशेष
दिवा स्वप्नों में भी अब रहेगा सब स्मृति शेष
चाहूं भी तो आओगे क्या फिर कभी कहीं?
कहूँ भी तो बोलोगे फ़िर ..या .. कभी नहीं ..?

स्मृति शेष -रजत ( 25th dec -23rd feb 2013)

rajat2 स्मृति शेष ..निज तिग्मांशु
अंतस में भर तृप्ति का अतृप्त सा उजाला
बूंदे तो ढलकी बिखरी
तोष की कि रोष की या कि पिघली  वेदना …
नितांत निजस्वता से
धरती पर टंका रुपहला सा आसमानी सितारा
बिंदु भर पसरा सन्नाटा
फिर से लील गया धरा का बेचैन बंजर कोन
कपूर होता महकता सामीप्य
ह्रदय कोष में बंद कस्तूरी .. कहाँ ढूंढे भावोर्मिया
रूप हवाले अग्नि के
अरूप है मृत्युन्जय ..असीम शेष अनुभूतियाँ