अवगुंठन

पलकों के अवगुंठन में
दो दीप जले थे सपनो के
जो करुण बने ले उउड़ा  गरुण
बहते बहते सब वरुण हुए
चिंतन मंथन और लाख जतन
गिरते सम्हले पल क्षण रतन हुए
स्वप्न  धूमिल हुए गोधूली में
ढलका घूँघट जब सूर्य हुए
पलकों के उत्थान पतन में

हिय अनल हुआ भाव अनिल हुए
 vaani vilaas

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2 thoughts on “अवगुंठन

  1. भाव तादात्मय , घनीभूत संवेदना और अवगुंठन में वेदना …. दी… मर्मस्पर्शी भर नहीं कह पा रही… मर्म से उपजते शब्द…
    पलकों के ढलते उगते अवगुंठन
    स्वप्न करे कीलित क्रंदन
    दीप सा ज्योतित हो जीवन
    शलभ सम जलें उर बंधन
    ….. मेरा प्रणाम आपको ….

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