ढीठ कुहासा

 

सलोनी चूनर में मुंह को छुपाकर
कक्ष के बहाने अन्दर प्रवेश करता ढीठ कुहासा
श्वेत धुंध का वशीकरण ..काले जादू में बंधा ‘मान’
भीतर तक समाता गया ‘होने’ का भान
भावों के वितान पर महकी संजीवनी
विलीन होती श्रीहत प्रभा में मुक्त वंदिनी
छला समय गरुण से ..निस्तेज गोलक
विस्मृत हुइ ..धूमिल दिशायें और दशाएं
पिघले नवनीत ..स्वप्निल स्मृति कोष
कोरों में सिहरे अप्रतिम काया पिंडोल
धुंधली सी आवारगी .. मंत्रमुग्ध ह्रदय हिंडोल

मुखर होने से पूर्व ही ..हर बार जज़्ब होता ..
संज्ञा शून्य करता स्थितप्रज्ञ ठहराव
बन सतत प्रवाहित जीवनी शक्ति
चुप सी प्रतीक्षित .. अभीष्ट की आस

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3 thoughts on “ढीठ कुहासा

  1. मै क्या लिखूं . गूढता और कोहरे घनत्व , जिजीविषा काद्वार रोके खड़ा है . जल्दी ही छटेगा कुहासा और मार्तंड की किरणे जीवन बिखरायेगी.

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  2. धरा के बेहद करीब उपजे मेघ… माने कोहरा… और उसका यूँ धरती को छुपा लेना… श्रृंगार पूर्ण भाव या एक ऐसा नेह जो बेहद protective है … एक अलग ही अनूठा… सम्बन्ध… और दी… इस दृष्टिकोण से देखें तो… समस्त भाव प्रकृति प्रदत्त… निसंदेह संजीवनी से हैं…
    और अभीष्ट… अंतहीन प्रतीक्षा के गहरे भंवर से निकलने ही कब देता है…
    आपकी रचना… मुझे हमेशा एक अलग ही दिशा देती है… सोचने के लिए… और इसके लिए…आपको धन्यवाद भरा प्रणाम दी…

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    • ye prateeksha hi to hai vandana jo prakriti ke chakra ko nirbadh gati deti hai…aur ye jo behad kareeb hote hain aksar nami chor jate hain koron par…aur ye adhikaar hai unka..srijan ka awasar bhi aur paseejapan bhi…unse hi jo milta hai…bilkul sahi kaha…isiliye to ye sanjeevni hai
      sarv samrth ho ke bhi itna maan dene ke liye snehasheesh vandana……sada sarvada sukhi raho…

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