अवगुंठन

पलकों के अवगुंठन में
दो दीप जले थे सपनो के
जो करुण बने ले उउड़ा  गरुण
बहते बहते सब वरुण हुए
चिंतन मंथन और लाख जतन
गिरते सम्हले पल क्षण रतन हुए
स्वप्न  धूमिल हुए गोधूली में
ढलका घूँघट जब सूर्य हुए
पलकों के उत्थान पतन में

हिय अनल हुआ भाव अनिल हुए
 vaani vilaas

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ढीठ कुहासा

 

सलोनी चूनर में मुंह को छुपाकर
कक्ष के बहाने अन्दर प्रवेश करता ढीठ कुहासा
श्वेत धुंध का वशीकरण ..काले जादू में बंधा ‘मान’
भीतर तक समाता गया ‘होने’ का भान
भावों के वितान पर महकी संजीवनी
विलीन होती श्रीहत प्रभा में मुक्त वंदिनी
छला समय गरुण से ..निस्तेज गोलक
विस्मृत हुइ ..धूमिल दिशायें और दशाएं
पिघले नवनीत ..स्वप्निल स्मृति कोष
कोरों में सिहरे अप्रतिम काया पिंडोल
धुंधली सी आवारगी .. मंत्रमुग्ध ह्रदय हिंडोल

मुखर होने से पूर्व ही ..हर बार जज़्ब होता ..
संज्ञा शून्य करता स्थितप्रज्ञ ठहराव
बन सतत प्रवाहित जीवनी शक्ति
चुप सी प्रतीक्षित .. अभीष्ट की आस