सुन सको गर …

सुन सकें गर….अनमोल रिश्ते ….

हैं लिए.. मान और नेह की प्रबल संभावनाएं
फिर ह्रदय का अधिकार आ कर ..कंठ तक ..क्यूँ..
निरुपाय होकर रह गया ..निष्प्राण सा

वक़्त से संस्कारित…मर्यादित सीमायें…क्यूँ
जकड़े हुए हैं..सर से पाँव तक…
भाव बिसरा पड़ा बेचारा ..हाय …सा

कृशकाय सा नासूर..अब नहीं कुछ वर्जनाएं
खिसकते दिनों में हथेलियों पे हाथ धर
क्यूँ शुष्क आँखें ..समुन्दर का लगाये हाट सा

सुन सकें  गर हर पलों की ..मूक गर्जनाएं
भीग जाये धड़कने ..हो हर सांस नम
जीवित हैं..मरे नहीं…हो ये आभास सा…