मैं धरा

 

कोहरे से लिपटी खोयी-खोयी सी धरा

छिपी -छिपी थी ओढ़ सरसों का खेत ज़रा

खुद को लपेट रक्खा था सोच के दुशाले में

दुबक गयी और भी–देख–केसरिया ओस ओट से

डर गयी छन छन कर जमते गए सवालों के ढेर से

हरियाली में पगी अस्तित्व की सोंधी कशिश को

तलाशने लगी ”जीवन” खुद को खुद में समेटते हुए

 

क्यूँ बह रहा है जीवन..स्थायित्व नहीं प्रतीक्षामें

स्वाभाविक नैसर्गिक अपेक्षा में..सापेक्ष अस्तित्व परीक्षा में

उर्जा मिलती है ज़रा ज़रा..भीख में मिली भीक्षा में

आती जाती पदचापों में…हलकी तेज़ फुहारों में

तपती गुनगुनी किरणों में..सहराती सिहराती हवाओं में

हंस पड़ी धरा भीगे नैनो से अधरों की फैली  गहरी हंसी में

अपने खोखलेपन की भरी पूरी संतुष्टि के साथ ..मान लिया

 

 

वो कोना धूप का..वो बारिश की चंद बूंदें ..वो क़दमों की आहट

वो हरियाली .वो पहाड़ वो नदियाँ.. वो सागर .वो हवाएं.

जिसने भी छू भर लिया .वो उसका अपना है ..अपनों से भी अपना

धुंध को चीर कर  …चुप सी निकल पड़ी.. मूक बधिर धरा ..

अंतस के मौन ने ली अंगडाई ..ख़ामोशी से नीरवता को आवाज़ लगायी

और फिर .पहले जैसा. धुरी  पर निरंतर घूमता .”एक ठहराव” ……

 

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7 thoughts on “मैं धरा

  1. “एक मनुहार और एक उपकार… और….एक… नन्हा सा आभार… ”

    शब्द शब्द सुप्त ह्रदय में भी भाव भरने में सक्षम … यही आपकी लेखनी का कमाल है… कोहरे में. लिपटी धरा पकृति का अनुपम उपहार….
    अन्तःस्थल से आती पुकार … हिल उठे हृदय का तार तार ….
    किन्तु नहीं अवसाद कोई… बस आहा ! पुलकित विचार ….
    विशाल… अनुपम… विस्तार… पाए सृजन विस्तार…
    सादर…

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    • वंदना,….इस मान ..इस स्नेह,…और मिश्री में पगे प्रेरित करने वाले शब्दों के लिए कुछ भी …..
      आसीम स्नेह के दुशाले में लिपटी ढेर सारी दुआएं …….

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  2. वंदना की बात से शत प्रतिशत सहमत होते हुए , प्रबल उत्कंठा के बावजूद ,शब्दों की कमी मेरे विचारों के प्रकटन में बाधा है . इतना तो कहूँगा की “जितने भी शब्द छू भर लिया .वो आपका अपना है ..अपनों से भी अपना” मन आह्लादित और तृप्त हुआ.

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