~लौ~

बुझे मन की वर्तिका से

श्रीहत् उजाला जल रहा

हताश स्थिर बवंडर से

हिचकिचाता रिस रहा

विमुख होआस के

उठते धुंए से

औंधा पड़ा

लकीरों में बह रहा

****

मिट्टी हो जब भूमि से

जन्म लेगा फिर दिया

धर्म अपना नए सिरे से

जल के गढ़ेगा कह रहा

 

मन चाह रहा एक बार फिर विश्वास करूँ …कर लूँ?

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~ झुर्रियों से झिर्रियों तक ~

..

पकी उम्र की दीवारों की

भदरंगी सुगबुगाहट

 पिघलती कालिमा के मध्य

उमगती चुटकी भर हरीतिमा

 एक अंजुरी धूप की

दबी ढंकी गुनगुनाहट

बंद कपाट बेचैन सांकल

झुर्रियों से झिर्रियों तक

जोहे छुवन ,आमद आहट

एक दुनिया ढल रही है

एक संवर कर निखर रही है

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~वारूँ मैं सदके~

नवनीत सी फिसल कर हमारे हाथों से नयी पीढ़ी के हाथों बागडोर चली गयी

पीढ़ियों से ढलके
माला के मनके
ठिनके औ ठुमके
चमके औ खनके
जुड़े जो उडके
हवाओं से तिनके
खिल के महके
अपनों में घुल के
डोरी है लोहित
थामे है कसके
सम्हले न टोके
हर्षित हो झलके
आँखों से टपके
होंठों पे थिरके
मन-मन में दीये
जलाऊँ जी भरके
नज़र के टीके
वारूँ मैं सदके

~अपने जड़ों की परिधि~

केंद्र में स्थित दो आंखें

एडी से धरा को दबाती

गोलाप्रकर सी

चरों तरफ खींच लेती

अपने जड़ों की परिधि

सींचती रहती

खुद के बनाये घेरे को

उग आये जिसमें

कंटीले बाड़

रेखाओं के भीतर

चुभती नुकीले पाश

अनुभूतियों में उलझे

हल्के गाढे छोटे बड़े

विधिना के वलय

विमुख हो बुद्ध हुए

जाना और माना

नियोजित रंगों का

श्वेत श्याम जीवन दर्शन

व्यर्थ मोहन / सम्मोहन

घायल हो रहा केंद्र

प्रश्नचिन्ह रहेगा शेष

अनुत्तरित

सदा सर्वदा

~ हम :गत कथ्य ~

ham...

हम उर्वर भी हम बंजर भी

हम शक्तिपुंज पर निर्भर भी

हम आयुष्मान मृतप्राय सदृश

हम सहें दृष्टिकोण के खंजर भी

हम केंद्र कभी और परिधि भी

हम पियूष कवच विष औषधि भी

हम मान कभी   बे माने भी

हम सारहीन सारार्थी,सतत ताने भी

हम नेपथ्य हुए बिन अंत ,अदृश्य

यवनिका गिरी नहीं पर खेल खतम

हम मूक बधिर पात्र भी दर्शक भी

हम कथ्य शून्य गाथा के

धुंधले अक्षर और निरर्थक भी

(सारार्थी-लाभ उठाने का इच्छुक )

~हाँ वो ही लम्हा~

जिंदगी से तरबतर
बूँद बूँद टपक रहा
सपनीली हवाओ से
सीलता रहा
वक़्त की आंच भी
ना सुखा सकी जिसे
हाँ वो ही लम्हा…
लम्हा लम्हा भीगता रहा .

~~आम की सूखी टहनी ~~

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रंग रोगन करे हुए
मैक्रमें धागों की रंगोली में
बया का घोंसला धारे
चित्ताकर्षक
मनमोहक
अपनी उपस्थिति से
लुभाती
ईर्ष्या द्वेष का बीज
उपजाति
 अनायास ही
 भवितव्यता बन गयी
उसी कलात्मक हाथों के
जीवन की

 हम खुद ही
अपने हाथों से
रचते हैं
अनजाने ही
 अपनी किस्मत

सूखी  टहनियों पर
खाली घोंसला
या फिर
निर्जीव टहनियों में
भरते
 जीवन के रंग
वैभव के वातायन से
ले कर आते
जीवन की गंध
सायास रखते
जीवंत
अपना घोंसला

हठात
आदतन अभ्यास कर
पूर्ण हो जाते
अपनी उपस्थिति से
स्वयंसिद्धा बन कर

सच झूठ से परे
बीतते हैं
दौड़ते खिसकते
सरकते फिर रेंगते  हैं
 और
पूरे हो जाते हैं

जीवनपर्यंत
स्वावलम्बन से
सुसज्जित
हर्षित …
मैंने माना
तुम भी मान लो ना !!!